दशक आठवा : समास सातवा : मोक्षलक्षण

समास सातवा : मोक्षलक्षण || ८.७ ||
॥श्रीराम॥ मागां श्रोतयांचा पक्ष | कितां दिवसां होतो
मोक्ष | तेचि  कथा  श्रोते  दक्ष | होऊन ऐका ||१||
मोक्षास कैसें जाणावें | मोक्ष कोणास म्हणावें |
संतसंगें  पावावें  |  मोक्षास  कैसें  ||२||
तरी बद्ध म्हणिजे बांधला | आणी मोक्ष म्हणिजे मोकळा
जाला | तो  संतसंगें  कैसा  लाधला  |  तेंहि ऐका ||३||
प्राणी संकल्पें बांधला | जीवपणें बद्ध जाला |
तो  विवेकें  मुक्त  केला  | साधुजनीं  ||४||
मी जीव ऐसा संकल्प | दृढ धरितां गेले कल्प |
तेणें  प्राणी  जाला  अल्प  | देहबुद्धीचा  ||५||
मी जीव  मज बंधन | मज आहे जन्ममरण |
केल्या कर्माचें फळ आपण | भोगीन आतां ||६||
पापाचें फळ तें दुःख | आणी पुण्याचें फळ तें
सुख | पापपुण्य अवश्यक | भोगणें लागे ||७||
पापपुण्य भोग सुटेना | आणी गर्भवासही तुटेना |
ऐसी  जयाची  कल्पना  |  दृढ  जाली  ||८||
तया नाव  बांधला | जीवपणें  बद्ध जाला |
जैसा स्वयें बांधोन कोसला | मृत्य पावे ||९||
तैसा प्राणी तो अज्ञान | नेणें भगवंताचें ज्ञान |
म्हणे  माझें  जन्ममरण  |  सुटेचिना  ||१०||
आतां कांहीं दान करूं | पुढिल्या जन्मास आधारु |
तेणें  सुखरूप  संसारु  |  होईल  माझा  ||११||
पूर्वीं  दान  नाहीं  केलें | म्हणोन  दरिद्र  प्राप्त
जालें | आतां तरी कांहीं केलें | पाहिजे कीं ||१२||
म्हणौनी  दिलें  वस्त्र  जुनें | आणी येक तांब्र
नाणें | म्हणे आतां कोटिगुणें | पावेन पुढें ||१३||
कुशावर्तीं कुरुक्षेत्रीं | महिमा ऐकोन दान करी |
आशा धरिली अभ्यांतरीं | कोटिगुणांची ||१४||
रुका आडका दान केला | अतितास टुकडा घातला |
म्हणे माझा ढीग जाला | कोटि टुकड्यांचा ||१५||
तो मी खाईन पुढिलिये जन्मीं | ऐसें कल्पीं अंतर्यामीं |
वासना  गुंतली  जन्मकर्मीं  |  प्राणीयांची  ||१६||
आतां मी जें देईन | तें पुढिले जन्मीं पावेन |
ऐसें कल्पी  तो अज्ञान | बद्ध जाणावा ||१७||
बहुतां जन्माचे अंतीं | होये नरदेहाची प्राप्ती |
येथें न होतां ज्ञानें सद्गती | गर्भवास चुकेना ||१८||
गर्भवास नरदेहीं घडे | ऐसें हें सर्वथा न घडे |
अकस्मात भोगणें पडे | पुन्हा नीच योनी ||१९||
ऐसा निश्चयो शास्त्रांतरीं | बहुतीं केला बहुतांपरीं |
नरदेह  संसारीं  |  परम  दुल्लभ  असे  ||२०||
पापपुण्य  समता  घडे  |  तरीच  नरदेह  जोडे |
येरवीं हा जन्म न घडे | हें व्यासवचन भागवतीं ||२१||
३५] नरदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं |
    प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं |  
    मायानुकूलेन नभस्वतेरितं |
    पुमान्भवाब्धिं न तरेत्स आत्महा || १ ||
नरदेह दुल्लभ | अल्प संकल्पाचा लाभ |
गुरु कर्णधारी स्वयंभ | सुख पाववी ||२२||
देव अनुकूळ नव्हे जया | स्वयें पापी तो प्राणीया |
भवाब्धी न तरवे तया | आत्महत्यारा बोलिजे ||२३||
ज्ञानेंविण प्राणीयांसी | जन्ममृत्य लक्ष चौऱ्यासी |
तितुक्या आत्महत्या त्यासी | म्हणोन आत्महत्यारा ||२४||
नरदेहीं ज्ञानेंविण | कदा न चुके जन्ममरण |
भोगणें लागती दारुण | नाना नीच योनी ||२५||
रीस मर्कट श्वान सूकर | अश्व वृषभ म्हैसा खर |
काक कुर्कुट जंबुक मार्जर | सरड बेडुक मक्षिका ||२६||
इत्यादिक नीच योनी | ज्ञान नस्तां भोगणें जनीं |
आशा धरी मूर्ख प्राणी | पुढिलिया जन्माची ||२७||
हा नरदेह पडतां | तोंचि पाविजे मागुतां |
ऐसा विश्वास धरितां | लाज नाहीं ||२८||
कोण पुण्याचा संग्रहो | जे पुन्हा पाविजे नरदेहो |
दुराशा धरिली पाहो | पुढिलिया जन्माची ||२९||
ऐसे मूर्ख अज्ञान जन | केलें संकल्पें बंधन |
शत्रु आपणासि आपण | होऊन ठेला ||३०||
३६] आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ||||
ऐसे संकल्पाचें बंधन | संतसंगे तुटे जाण |
ऐक  तयाचें  लक्षण  |  सांगिजेल  ||३१||
पांचाभूतांचें शरीर | निर्माण जालें सचराचर |
प्रकृतिस्वभावें जगदाकार | वर्तों लागे ||३२||
देह अवस्ता अभिमान | स्थानें भोग मात्रा गुण |
शक्ती आदिकरुन लक्षण | चौपुटी तत्वांचें ||३३||
ऐसी पिंडब्रह्मांडरचना | विस्तारें वाढली कल्पना |
निर्धारितां  तत्वज्ञाना  |  मतें  भांबावलीं ||३४||
नाना मतीं नाना भेद | भेदें  वाढती  वेवाद |
परी तो ऐक्यतेचा संवाद | साधु जाणती ||३५||
तया संवादाचें लक्षण | पंचभूतिक देह जाण |
त्या देहामधें कारण | आत्मा वोळखावा ||३६||
देह अंती नासोन जाये | त्यास आत्मा म्हणों नये |
नाना  तत्वांचा  समुदाय | देहामध्यें  आला ||३७||
अंतःकर्ण प्राणादिक | विषये इंद्रियें दशक |
हा सूक्ष्माचा विवेक | बोलिला शास्त्रीं ||३८||
घेतां सूक्ष्माची शुद्धी | भिन्न अंतःकरण मन बुद्धी |
नाना  तत्वांचे  उपाधी | वेगळा  आत्मा  ||३९||
स्थूळ सूक्ष्म कारण | माहाकारण विराट हिरण्य |
अव्याकृत मूळप्रकृति जाण | ऐसे अष्टदेह ||४०||
च्यारी पिंडी च्यारी ब्रह्मांडीं | ऐसी अष्टदेहाची प्रौढी |
प्रकृती  पुरुषांची  वाढी | दशदेह  बोलिजे  ||४१||
ऐसें तत्वांचे लक्षण | आत्मा साक्षी विलक्षण |
कार्यकर्ता  कारण  |  दृश्य  तयाचें  ||४२||
जीवशिव  पिंडब्रह्मांड  |  मायेअविद्येचें  बंड  |
हें सांगता असे उदंड | परी आत्मा तो वेगळा ||४३||
पाहों जातां आत्मे च्यारी | त्यांचे लक्षण अवधारीं |
हें  जाणोनि  अभ्यांतरीं  |  सदृढ  धरावें  ||४४||
येकजीवात्मा दुसराशिवात्मा | तिसरापरमात्मा जो विश्वात्मा |
चौथा  जाणिजे  निर्मळात्मा  |  ऐसे  च्यारी  आत्मे ||४५||
भेद उंच नीच भासती | परी च्यारी येकचि असती |
येविषीं  दृष्टांतसंमती  |  सावध  ऐका  ||४६||
घटाकाश मठाकाश | महदाकाश चिदाकाश |
अवघे मिळोन आकाश | येकचि असे ||४७||
तैसा  जीवात्मा  आणी शिवात्मा | परमात्मा  आणी
निर्मळात्मा | अवघा मिळोन आत्मा | येकचि असे ||४८||
घटीं व्यापक जें आकाश | तया  नाव  घटाकाश |
पिंडी व्यापक ब्रह्मांश | त्यास जीवात्मा बोलिजे ||४९||
मठीं व्यापक जें आकाश | तया  नाव  मठाकाश |
तैसा ब्रह्मांडीं जो ब्रह्मांश | त्यास शिवात्मा बोलिजे ||५०||
मठाबाहेरील  आकाश  |  तया  नाव  महदाकाश |
ब्रह्मांडाबाहेरील ब्रह्मांश | त्यास परमात्मा बोलिजे ||५१||
उपाधीवेगळें आकाश | तया नाव चिदाकाश |
तैसा निर्मळात्मा परेश | तो उपाधीवेगळा ||५२||
उपाधीयोगें वाटे भिन्न | परी तें आकाश अभिन्न |
तैसा  आत्मा  स्वानंदघन  |  येकचि असे  ||५३||
दृश्य  सबाह्य  अंतरीं | सूक्ष्मात्मा  निरंतरीं |
त्याची वर्णावया थोरी | शेष समर्थ नव्हे ||५४||
ऐसे आत्म्याचें लक्षण | जाणतां नाहीं जीवपण |
उपाधी शोधितां अभिन्न | मुळींच आहे ||५५||
जीवपणें  येकदेसी | अहंकारें जन्म सोसी |
विवेक पाहतां प्राणीयांसी | जन्म कैंचा ||५६||
जन्ममृत्यापासून सुटला | या नाव जाणिजे मोक्ष
जाला | तत्वें शोधितां पावला | तत्वता वस्तु ||५७||
तेचि वस्तु ते आपण | हें माहावाक्याचें लक्षण |
साधु  करिती  निरूपण | आपुलेन मुखें ||५८||
जेचि क्षणी अनुग्रह केला | तेचि क्षणीं मोक्ष जाला |
बंधन  कांहीं  आत्मयाला  |  बोलोंचि  नये  ||५९||
आतां आशंका फिटली | संदेहवृत्ती मावळली |
संतसंगें  तत्काळ  जाली | मोक्षपदवी ||६०||
स्वप्नामधें जो बांधला | तो जागृतीनें मोकळा
केला | ज्ञानविवेकें प्राणीयाला | मोक्षप्राप्ती ||६१||
अज्ञाननिसीचा अंतीं | संकल्पदुःखें नासती |
तेणें गुणें होये प्राप्ती | तत्काळ मोक्षाची ||६२||
तोडावया स्वप्नबंधन | नलगे आणीक साधन |
तयास प्रेत्न जागृतीवीण | बोलोंचि नये ||६३||
तैसा संकल्पें बांधला जीव | त्यास आणीक नाही
उपाव | विवेक पाहतां वाव | बंधन होये ||६४||
विवेक पाहिल्याविण | जो जो उपाव तो तो सीण |
विवेक  पाहातां  आपण  |  आत्माच असे ||६५||
आत्मयाचा ठाईं कांहीं | बद्ध मोक्ष दोनी नाहीं |
जन्ममृत्य हें सर्वही | आत्मत्वीं न घडे ||६६||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
मोक्षलक्षणनाम समास सातवा || ८.७ ||

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