दशक सातवा : चतुर्दश ब्रह्म : समास पांचवा : द्वैतकल्पनानिर्शन

समास पांचवा : द्वैतकल्पनानिर्शन || ७.५ ||
॥श्रीराम॥ केवळ ब्रह्म जें बोलिलें तें अनुभवास
आलें आणी मायेचेंहि लागलें अनुसंधान ||||
ब्रह्म अंतरीं प्रकाशे  |  आणी  मायाहि प्रत्यक्ष
दिसे आतां हें द्वैत निरसे कवणेपरी हो ||||
तरी आतां सावधान येकाग्र करूनियां
मन मायाब्रह्म हें कवण जाणताहे ||||
सत्य ब्रह्माचा संकल्प मिथ्या मायेचा विकल्प |
ऐसिया  द्वैताचा  जल्प मनचि  करी  ||||
जाणे ब्रह्म जाणे माया ते येक जाणावी तुर्या |
सर्व जाणे  म्हणोनिया  |  सर्वसाक्षिणी  ||||
ऐक तुर्येचें लक्षण जेथें सर्व जाणपण |
सर्वचि  नाहीं  कवण  जाणेल गा ||||
संकल्पविकल्पाची सृष्टी जाली मनाचिये पोटीं |
तें मनचि मिथ्या शेवटीं साक्षी कवणु ||||
साक्षत्व चैतन्यत्व सत्ता हे गुण ब्रह्माचिया
माथां आरोपले जाण वृथा मायागुणें ||||
घटामठाचेनि  गुणें  |  त्रिविधा  आकाश
बोलणें मायेचेनि खरेंपणें गुण ब्रह्मीं ||||
जव खरेपण मायेसी तवचि साक्षत्व ब्रह्मासी |
मायेअविद्येचे  निरासीं  |  द्वैत  कैचें  ||१०||
म्हणोनि सर्वसाक्षी मन तेंचि जालिया उन्मन |
मग  तुर्यारूप  ज्ञान तें मावळोन  गेलें  ||११||
जयास द्वैत भासलें तें मन उन्मन जालें |
द्वैताअद्वैताचें  तुटलें  |  अनुसंधान  ||१२||
येवं द्वैत आणी अद्वैत होये वृत्तीचा संकेत |
वृत्ति  जालिया निवृत्त द्वैत  कैंचें  ||१३||
वृत्तिरहित जें ज्ञान तेंचि पूर्ण समाधान |
जेथें तुटे अनुसंधान मायाब्रह्मीचें  ||१४||
मायाब्रह्म ऐसा हेत मनें कल्पिला संकेत |
ब्रह्म कल्पनेरहित जाणती  ज्ञानी  ||१५||
जें मनबुद्धिअगोचर जें कल्पनेहून पर |
तें अनुभवितां साचार द्वैत कैंचें  ||१६||
द्वैत पाहातां ब्रह्म नसे ब्रह्म पाहातां द्वैत
नासे द्वैताद्वैत भासे कल्पनेसी ||१७||
कल्पना माया निवारी कल्पना ब्रह्म थावरी |
संशय धरी आणी वारी तेही कल्पना ||१८||
कल्पना करी बंधन कल्पना दे समाधान |
ब्रह्मीं लावी अनुसंधान तेही कल्पना ||१९||
कल्पना द्वैताची माता कल्पना ज्ञेप्ती तत्वता |
बद्धता  आणी  मुक्तता  |  कल्पनागुणें ||२०||
कल्पना अंतरीं सबळ नस्ते दावी ब्रह्मगोळ |
क्षणा येकातें निर्मळ स्वरूप कल्पी ||२१||
क्षणा येका  धोका  वाहे क्षणा  येका स्थिर
राहे क्षणा येका पाहे विस्मित होउनी ||२२||
क्षणा  येकातें  उमजे क्षणा येकातें निर्बुजे |
नाना विकार करिजे ते कल्पना जाणावी ||२३||
कल्पना जन्माचें मूळ कल्पना भक्तीचें फळ |
कल्पना  तेचि  केवळ  |  मोक्षदाती  ||२४||
असो ऐसी हे कल्पना साधनें दे समाधाना |
येरवीं  हे  पतना  |  मूळच  कीं  ||२५||
म्हणौन  सर्वांचें  मूळ  |  ते हे  कल्पनाच
केवळ इचें केलियां निर्मूळ ब्रह्मप्राप्ती ||२६||
श्रवण आणी मनन निजध्यासें समाधान |
मिथ्या कल्पनेचें भान उडोन जाये ||२७||
शुद्ध ब्रह्माचा निश्चयो करी कल्पनेचा जयो |
निश्चितार्थें  संशयो तुटोन  गेला  ||२८||
मिथ्या कल्पनेचें कोडें कैसें राहे साचापुढें |
जैसें  सूर्याचेनि  उजेडें नासे तम  ||२९||
तैसें ज्ञानाचेनि प्रकाशें मिथ्या कल्पना हे
नासे मग हें तुटे अपैसें द्वैतानुसंधान ||३०||
कल्पनेनें कल्पना उडे जैसा मृगें मृग सांपडे |
कां  शरें  शर  आतुडे आकाशमार्गीं  ||३१||
शुद्ध कल्पनेचें बळ जालियां नासे सबळ |
हेंचि  वचन  प्रांजळ सावध ऐका  ||३२||
शुद्ध कल्पनेची खूण स्वयें कल्पिजे निर्गुण |
सस्वरूपीं  विस्मरण  |  पडोंचि नेदी  ||३३||
सदा स्वरूपानुसंधान करी द्वैताचें निर्शन |
अद्वैयनिश्चयाचें ज्ञान तेचि शुद्ध कल्पना ||३४||
अद्वैत कल्पी ते शुद्ध द्वैत कल्पी ते अशुद्ध |
अबुद्ध तेंचि प्रसिद्ध सबळ जाणावी ||३५||
शुद्ध कल्पनेचा अर्थ अद्वैताचा निश्चितार्थ |
आणी  सबळ  वेर्थ द्वैत कल्पी  ||३६||
अद्वैतकल्पना प्रकाशे तेचि क्षणीं द्वैत नासे |
द्वैतासरिसी  निरसे सबळ कल्पना ||३७||
कल्पनेनें कल्पना सरे ऐसी जाणावी चतुरें |
सबळ गेलियां नंतरें | शुद्ध उरली ||३८||
शुद्ध कल्पनेचें रूप तेंचि जें कल्पी स्वरूप |
स्वरूप कल्पितां तद्रूप होये आपण ||३९||
कल्पनेसी  मिथ्यत्व  आलें सहजचि  तद्रूप
जालें आत्मनिश्चयें नासिलें कल्पनेसी ||४०||
जेचि  क्षणीं  निश्चये  चळे तेचि  क्षणीं  द्वैत
उफाळे जैसा अस्तमानीं प्रबळे अंधकार ||४१||
तैसें  ज्ञान  होतां  मळिन अज्ञान  प्रबळे
जाण याकारणें श्रवण अखंड असावें ||४२||
आतां  असो  हें  बोलणें  जालें आशंका फेडूं येका
बोलें जयास द्वैत भासलें तें तूं नव्हेसी सर्वथा ||४३||
मागील आशंका फिटली इतुकेन हे कथा संपली |
पुढें  वृत्ति  सावध  केली  |  पाहिजे श्रोतीं ||४४||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
द्वैतकल्पनानिर्शननाम समास पांचवा || ७.५ ||

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