दशक सातवा : चतुर्दश ब्रह्म : समास दुसरा : ब्रह्मनिरूपण-२*

समास दुसरा : ब्रह्मनिरूपण-२* || . ||
॥श्रीराम॥ ब्रह्म  निर्गुण  निराकार ब्रह्म  निःसंग
निर्विकार ब्रह्मासि नाहीं पारावार बोलती साधु ||||
ब्रह्म सर्वांस  व्यापक ब्रह्म  अनेकीं  येक |
ब्रह्म शाश्वत हा विवेक बोलिला शास्त्रीं ||||
ब्रह्म अच्युत  अनंत ब्रह्म सदोदित संत |
ब्रह्म  कल्पनेरहित  |  निर्विकल्प  ||||
ब्रह्म  या  दृश्यावेगळें  |  ब्रह्म  सुन्यत्वास
निराळें ब्रह्म इंद्रियांच्या मेळें चोजवेना ||||
ब्रह्म दृष्टीस दिसेना ब्रह्म मूर्खासी असेना |
ब्रह्म  साधुविण  येना अनुभवासी  ||||
ब्रह्म  सकळांहूनि  थोर  |  ब्रह्मा  ऐसें  नाहीं
सार ब्रह्म सूक्ष्म अगोचर ब्रह्मादिकांसी ||||
ब्रह्म शब्दीं ऐसें तैसें बोलिजे त्याहूनि अनारिसें |
परी  तें  श्रवणअभ्यासें  |  पाविजे  ब्रह्म  ||||
ब्रह्मास नामें अनंत परी तें ब्रह्म नामातीत |
ब्रह्मास  हेतदृष्टांत  देतां  न  शोभती ||||
ब्रह्मासारिखें दुसरें पाहातां काय आहे खरें |
ब्रह्म  दृष्टांत  उत्तरें कदा  न  साहे  ||||
२५] यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ||||
जेथें वाचा निवर्तती मनासी नाहीं ब्रह्मप्राप्ती |
ऐसी  बोलिली  श्रुती  |  सिद्धांतवचन  ||१०||
कल्पनारूप मन पाहीं ब्रह्मीं कल्पनाचि नाहीं |
म्हणौनि वाक्य कांहीं अन्यथा  नव्हे  ||११||
आतां मनासि जें अप्राप्त तें कैसे होईल प्राप्त |
ऐसें म्हणाल तरी कृत्य सद्गुरुविण नाहीं ||१२||
भांडारगृहें भरलीं परी असती आडकिलीं |
हातास न येतां किली सर्वही अप्राप्त ||१३||
तरी ते किली ते कवण मज करावी निरूपण |
ऐसा  श्रोता  पुसे  खूण  |  वक्तयासी  ||१४||
सद्गुरुकृपा तेचि किली जेणें बुद्धि प्रकाशली |
द्वैतकपाटें  उघडलीं  |  येकसरीं  ||१५||
तेथें सुख असे वाड नाहीं मनास पवाड |
मनेंविण   कैवाड  |  साधनाचा  ||१६||
त्याची  मनेंविण  प्राप्ती  |  किं  वासनेविण
तृप्ती तेथें न चले वित्पत्ती कल्पनेची ||१७||
तें परेहूनि  पर मनबुद्धी  अगोचर |
संग सोडितां सत्वर पाविजेतें ||१८||
संग सोडावा आपुला मग पाहावें तयाला |
अनुभवी तो या बोला सुखावेल  गा ||१९||
आपण म्हणिजे मीपण मीपण म्हणिजे जीवपण |
जीवपण  म्हणिजे  अज्ञान संग  जडला  ||२०||
सोडितां तया संगासी ऐक्य होये निःसंगासी |
कल्पनेविण  प्राप्तीसी अधिकार ऐसा  ||२१||
मी कोण ऐसें नेणिजे तया नाव अज्ञान बोलिजे |
अज्ञान  गेलियां  पाविजे  |  परब्रह्म  तें  ||२२||
देहबुद्धीचें थोरपण परब्रह्मीं न चले जाण |
तेथें  होतसे  निर्वाण अहंभावासी  ||२३||
उंच नीच नाहीं परी राया रंका येकचि सरी |
जाला पुरुष अथवा नारी येकचि पद  ||२४||
ब्राह्मणाचें ब्रह्म तें सोवळें शूद्राचें ब्रह्म तें वोवळें |
ऐसें  वेगळें  आगळें  |  तेथें  असेचिना ||२५||
उंच ब्रह्म तें रायासी नीच ब्रह्म तें परिवारासी |
ऐसा  भेद  तयापाशीं  |  मुळिंच  नाहीं ||२६||
सकळासि मिळोन ब्रह्म येक तेथें नाहीं हे अनेक |
रंक  अथवा  ब्रह्मादिक  |  तेथेंचि  जाती  ||२७||
स्वर्ग मृत्य आणि पाताळ तिहीं लोकींचे ज्ञाते सकळ |
सकळांसि  मिळोन  येकचि  स्थळ विश्रांतीचें  ||२८||
गुरुशिष्या येकचि पद तेथें नाहीं भेदाभेद |
परी या देहाचा समंध तोडिला पाहिजे ||२९||
देहबुद्धीचा अंतीं सकळांसि येकचि प्राप्ती |
येक ब्रह्म द्वितीयं नास्ति हें श्रुतिवचन ||३०||
साधु दिसती वेगळाले परी ते स्वरूपी मिळाले |
अवघे मिळोन येकचि जाले देहातीत वस्तु ||३१||
ब्रह्म नाहीं नवें जुनें ब्रह्म नाहीं अदिक उणें |
उणें  भावील  तें  सुणें  |  देहबुद्धीचें  ||३२||
देहबुद्धीचा संशयो करी समाधानाचा क्षयो |
चुके समाधानसमयो देहबुद्धियोगें ||३३||
देहाचें जें थोरपण तेंचि देहबुद्धीचें लक्षण |
मिथ्या जाणोनि विचक्षण निंदिती देहो ||३४||
देह पावे जंवरी मरण तंवरी धरी देहाभिमान |
पुन्हा दाखवी पुनरागमन देहबुद्धि मागुती ||३५||
देहाचेनि थोरपणें समाधानासी आलें उणें |
देहो पडेल कोण्या गुणें हेंहि कळेना ||३६||
हित  आहे  देहातीत म्हणौनि  निरोपिती
संत देहबुद्धीनें अन्हित होंचि लागे ||३७||
सामर्थ्यबळें देहबुद्धी योगियांसि तेहि बाधी |
देहबुद्धीची  उपाधी पैसावों  लागे  ||३८||
म्हणौनि देहबुद्धि हे झडे तरीच परमार्थ घडे |
देहबुद्धीनें  विघडे  |  ऐक्यता  ब्रह्मीची  ||३९||
विवेक वस्तूकडे ओढी देहबुद्धि तेथूनि पाडी |
अहंता  लाऊन  निवडी  |  वेगळेपणें  ||४०||
विचक्षणें याकारणें देहबुद्धि त्यजावी श्रवणें |
सत्यब्रह्मीं  साचारपणें मिळोन जावें  ||४१||
सत्यब्रह्म तें कवण ऐसा श्रोता करी प्रश्न |
प्रत्योत्तर दे आपण वक्ता श्रोतयासी ||४२||
म्हणे ब्रह्म येकचि असे परी तें बहुविध भासे |
अनुभव  देहीं  अनारिसे नाना मतीं  ||४३||
जें जें जया अनुभवलें तेंचि तयासि मानलें |
तेथेंचि  त्याचें  विस्वासलें अंतःकर्ण ||४४||
ब्रह्म नामरूपातीत असोनि  नामें बहुत |
निर्मळ निश्चळ निवांत निजानंद  ||४५||
अरूप अलक्ष अगोचर अच्युत अनंत अपरांपर |
अदृश्य  अतर्क्ये  अपार  |  ऐसीं नामें  ||४६||
नादरूप जोतिरूप चैतन्यरूप सत्तारूप |
साक्षरूप  सस्वरूप ऐसीं  नामें  ||४७||
सुन्य आणी सनातन सर्वेश्वर आणी सर्वज्ञ |
सर्वात्मा  जगजीवन  |  ऐसीं  नामें  ||४८||
सहज आणी सदोदित शुद्ध बुद्ध सर्वातीत |
शाश्वत आणी शब्दातीत ऐसीं नामें ||४९||
विशाळ विस्तीर्ण विश्वंभर विमळ वस्तु व्योमाकार |
आत्मा  परमात्मा  परमेश्वर  |  ऐसीं  नामें  ||५०||
परमात्मा  ज्ञानघन  |  येकरूप  पुरातन |
चिद्रूप चिन्मात्र जाण नामें अनाम्याचीं ||५१||
ऐसीं नामें असंख्यात परी तो परेश नामातीत |
त्याचा करावया निश्चितार्थ ठेविलीं नामें ||५२||
तो विश्रांतीचा विश्राम आदिपुरुष आत्माराम |
तें  येकचि  परब्रह्म  |  दुसरें  नाहीं  ||५३||
तेंचि कळायाकारणें चौदा ब्रह्मांचीं लक्षणें |
सांगिजेती तेणें श्रवणें निश्चयो बाणे ||५४||
खोटें निवडितां येकसरें उरलें तें जाणिजे खरें |
चौदा  ब्रह्में  शास्त्राधारें  |  बोलिजेती  ||५५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे


*ब्रह्मनिरूपण-२ नाम समास दुसरा || .२ ||

Popular posts from this blog

साधना करणाऱ्या पुरुषाला काय म्हणतात ?

नामात राहणे हा सरळ मार्ग आहे

सदगुरुंचे महत्व